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काशी में रामकृष्ण

     काशी में रामकृष्ण केदारघाट के दक्षिणी छोर पर गंगा जी की ओर बढ़ते हुए बड़े-बड़े भवनों की कतारें हैं। बंग शिल्प में निर्मित यह प्रासाद, भग्न लेकिन भव्य लगते हैं। ऊंचे और अभिमानी। बड़ी-बड़ी बारादरी औंधे चौरस गत्तों की तरह सजी हैं, एक दूसरे से सटी और सजातीयता से संयोजित। करीब 300 वर्ष पूर्व यह प्रासाद कलकत्ते से आये दीवान इन्द्रनारायण बापुली ने बनवाये थे। इन्द्रनारायण अवध नवाब के जागीरदार थे। मालदारों में गिनती थी। बापुली परिवार ऐश्वर्य का पर्याय था। लेकिन, इन भवनों पर उसकी छापें अब धूमिल हैं। काल प्रवाह से ऐश्वर्य अपनी गति को प्राप्त कर चुका है।  इन्हीं प्रासादों में से एक की अधनंगी दीवार पर बोर्ड टंगा है, जो बताता है कि यहां स्वामी रामकृष्ण परमहंस की पादुकायें रखी हैं। विराट व दिव्य स्मृतियों को सहेजे यह भवन अब डरावना लगता है, देह की भार से सीढियां कांप उठती हैं। लेकिन, जैसे-जैसे ऊपर बढ़ता हूं  अलौकिक अनुभव होता है। भीतर एक ही कमरा है जो जीर्णता से अछूता है। दरवाजा बंद है। मित्र शुभोजीत चिर-परिचित हंसी व अदब के साथ दरवाजा खोलते हैं।  दरवाजा खुलते ही---जैसे, आह...

भारत को घूमना, देखना और जानना  

मैं दोहराता रहा हूं कि सबको प्रयास करना चाहिए कि भारत को आपादमस्तक निहार आएं। भारत भूमि पर विचरने का सुख अनन्य है। आज गणतंत्र दिवस पर फिर कह रहा हूं। इस देश में रहकर इसे जानना बहुत जरूरी है, और जानने के लिए जरुरी है उसे देखना। यह देखना और जानना किताबों से संभव नहीं, न ही दूसरों के कहने सुनने के आधार पर व अनेकता में एकता जैसे लतीफों में सम्भव है। घूमना भी 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' नहीं, 'रियलाइजेशन ऑफ भारत' की दृष्टि से होना चाहिए।  भ्रमण से भ्रम का नाश होता है। इस देश का भ्रमण करने से पहला भ्रम यह टूटेगा कि यहां 'अनेकता' है। घूमेंगे तब इसे 'एक आत्मा से प्रदीप्त, विराट देह सा' पाएंगे। निज अनुभव से मान्यता यह बनी है कि 'अनेकता में एकता' का नारा भारत की एकात्मता के विरुद्ध षड्यंत्र है। अनेकता को स्वीकार लेने के बाद एकता फ़न्ताशी  बनकर जाती है। सामान्य व्यवहार में हम दोस्ती यारी भी समान आचार-विचार वालों से करते हैं। विचार भिन्न भये नहीं कि रिश्ता खत्म। फिर 'अनेकता में एकता' कहां से आएगी? राजकीय एकीकरण एकता तो है नहीं। सबसे पहले यह दिमाग से निकालना ...

सावरकर : 'मर जाना ही शौर्य होता' तो तलवार के साथ ढाल न बनाई जाती।

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     'मर जाना ही शौर्य होता' तो तलवार के साथ ढाल न बनाई जाती। कौशल तो स्वयं को बचाते हुए लड़ना है।  हमारे पास इस देह के अलावा और है क्या! सारे संकल्प, सारे संघर्ष, सारी आशाएं और आकांक्षाएं इसी से जुड़ी हैं।  इसे अकारण गंवा देना अपराध है। पाप है। देहोत्सर्ग दाधीच की तरह किया जाता है, जब बोध हो कि यह व्यर्थ न जाएगा।  बड़े उद्देश्य में लगे लोगों की देह तो और भी कीमती हो जाती है। उन्हें हर तरह से अपने जीवन को बचाने का प्रयास करना चाहिए।         प्रकृति ने यह जीवन दिया है, मां ने गर्भ में रखा है, पाला है। किसी  राजनीतिक अतिक्रम ण को इसे छीन लेने का अधिकार नहीं। लेकिन जब अंधेरे का ही साम्राज्य हो तो लड़ने की प्रविधि बदल लेनी चाहिए। सावरकर के क्या सपने थे, हम-आप नहीं जानते। वह तो जानते थे। उन्हें यह भी पता था कि वह सब इस देह के रहते ही सिद्ध हो सकेगा।  उन्होंने समृद्ध जीवन जीया, उद्देश्य को समर्पित जीवन जीया। देश की स्वतंत्रता को संघर्ष किया, स्वतंत्रता के लिए किया गया युद्ध भी यज्ञ हो जाता है।