पीठ पर ढाल वही ढोता है, जिसने कमर में तलवार बांधी होती है।

जिसने तलवार बनाई, उसी ने ढाल भी बनाई। क्योंकि, तलवार बनाने वाला उसकी भयावहता से परिचित था, उसकी जघन्यता का साक्षी था। उसे हमेशा डर रहा कि यह धार कभी उसकी काया को भी रंजित कर सकती है। उसका रक्त बहा सकती है।  पीठ पर ढाल वही ढोता है, जिसने कमर में तलवार बांधी होती है। उन्हें ढाल भी रखने की आवश्यकता नहीं जो तलवार नहीं उठाते।  सशस्त्र मानव संगठनों के बनने के बाद ही किलेबंदी की अवधारणा आई। उन्हें किलों की भी आवश्यकता नहीं जो नि:शस्त्रीकरण के हामी हैं।  क्योंकि,  जो जितना क्रूर है, निर्दयी है। उसमें सहनशक्ति उतनी ही थोड़ी होती है। वह हमेशा इस बात से आतंकित रहता है कि पलटकर जब यह क्रूरता उसके साथ होगी तो उससे अपना बचाव कैसे करेगा! वह क्रूरता की परिधि जितनी पसारता है, उतना ही खुद को किलों में, आड़ में, ढाल में समेटता-छुपाता चलता है। मन में जब नकार सघन होता है, उतना ही वह पाशबद्ध होता जाता है। पाश कसते जाते हैं। जकड़न अस्तित्व को संकुचित करती जाती है। इसलिए क्रूरता संगठित अपराध होकर भी, उसकी कोई दुनिया नहीं होती है, उसकी सीमा काया तक सीमित है। क्रूर व्यक्ति अपने जैसे व्यवहार वालों को भी मैत्रीभाव से नहीं देख सकता, उन्हें सहोदर नहीं कह सकता।  हम यह क्यों उम्मीद करते हैं, कि घृणा से बने चित्त के लोग उत्सवों के 'सार्वत्रिक स्वीकार की भावना' का सम्मान करेंगे। वह विश्वबंधुत्व की हमारी प्रार्थनाओं का हमेशा उपहास ही करते आये हैं।  तब भी, तलवार 'वह' भांज रहे हैं तो ढाल भी वही बांधे। हम तो उन्हें प्रत्युत्तर प्राप्त करने के योग्य भी नहीं मानते। अटैक-डिफेंड का खेल वही खेलें। वह दीयों के ताप से नहीं, भीतर की घृणा से जल रहे हैं। दीये तो कुछ देर बाद बुझ जाएंगे लेकिन वह जलते रहेंगे...भीतर ही भीतर, कोशिका दर कोशिका। शरद की सघन शीतलता भी उन्हें राहत न दे सकेगी।  (दीवाली, 2018)

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