साइकिल की सहयात्रा
सड़क के किनारे खड़ा था। यात्रा तो करनी थी पर साधन नहीं था। ऐसे तो यात्राओं को साधन की जरूरत नहीं होती, चलने वाले के लिए तो डग भर धरती है, पाल के प्रसार भर सागर, पंख भर आकाश है। तब भी, अखंड काल को खंड में बांटने का अपरिहार्य अभ्यास है--'समय से पहुंचना'। सो, परामुखापेक्षा के भाव से सड़क पर सरपट दौड़ते वाहनों को निहार रहा था। उन्हीं में से किसी एक से मदद लेनी थी।
'मैं जहां खड़ा हूं, यहां सार्वजनिक परिवहन की सुविधा नहीं है। शुभ्र तने वाले अर्जुनों के पांत की परिधि से बंधी, और उसकी चार धारियों वाली कौड़ियों से पटी यह गांवों को जोड़ने वाली सड़क----अनगिनत वलय लेकर लोटी हुई हैं। संकरी लेकिन निर्दोष।' जिस पर हर कोई अपनी प्रतिबद्धताएं लिए भागा जा रहा है। दौड़ते वाहनों को डामर के किनारों की कच्ची पटान से कोई वास्ता नहीं। मैं इन्हीं उपेक्षित धारियों पर खड़ा हूं। सोच रहा हूं, कोई थोड़ा अलमस्त, थोड़ा मतवाला गुजर जाये तो शायद मुझे देख ले। उसी की गति में किनारों का ख्याल हो सकता है। यूं हर किसी को आवाज देना भी अच्छा नहीं।
तभी एक लाल रंग की साइकिल वाला किशोर आकर ठहरता है, 'आपको कहीं चलना है, तो लिए चलूं।'
साइकिल की सहयात्रा का तो विचार ही नहीं किया था। यह पेशकश अनपेक्षित थी।
वह किशोर, मेरे जवाब की प्रतीक्षा कर रहा है।
'हां, थोड़ा आगे तक जाना है। तुम कहां तक जाओगे।' मैंने जवाब दिया।
'मैं तो बस ऐसे ही घूमना निकला हूं। आप जहां कहिये, वहां तक छोड़ दूंगा।'
मैं यह जवाब सुनकर मुस्कुरा दिया। कोई तो है जो अनायास यात्रा पर निकला है। लोग तो पड़ावों की पहचान कर यात्रा शुरू करते हैं। उसके चेहरे को देखता हूं, उसकी आँखों में अद्वितीय प्रदीप्ति है। देह में पुलक है।
'ठीक है, हाइवे तक छोड़ दो।' कहकर साइकिल पर सवार हो गया।
वह किशोर झूमते लहराते साइकिल दौड़ाने लगा। मैंने कुछ सोचकर कहा, 'मैं चलाऊं क्या! तुम थक जाओगे।' यह मेरा दायित्वबोध था, जो कह रहा था कि बच्चे के बल से यूं ढोया जाना अच्छा नहीं। उसने मदद की पेशकश की है, उससे श्रम करवाना अच्छा नहीं।
वह कह रहा है, नहीं! आप आराम से बैठिए। मैं छोड़ आऊंगा।
अब मुझे याद आ रही है, हमारी किशोरावस्था में इन दृष्टि की प्रसार तक फैले कृष्णकाय मार्गों पर टुनटुन बजती साइकिल की घंटियां।
सड़कों को तब साइकिलें ही नापती थीं। मैंने भी जनपद के प्रसार को साइकिल से नापा है। विद्यालय जाने को भी दिन में 30 किमी साइकिल चलानी होती थी। तब, साइकिल चलाना शौकिया काम नहीं था, वही एकमात्र सुलभता थी।
हम पैदल चलने वालों से पूछकर लिफ्ट दिया करते थे। लेकिन, एक शर्त के साथ। 'चलाना उन्हें होगा।' बहुधा लोग मदद की मांग के साथ ही चलाने की पेशकश भी रखते। हम उन्हें सहर्ष साइकिल सौंपकर कैरियर पर सज जाते। रास्ते भर खूब सारी बातें होतीं। वह परिचित हो जाते। अधिकतर मामलों में तो वह कोई पुराना रिश्तेदार निकलता या उन गांवों का जहां कोई करीबी संबंधी रहते होते। उन्हीं संबंधों के आधार पर संबोधन भी गढ़ लिए जाते। आज कितने करीबी लोग हैं, जो ऐसे ही मिले। साइकिल के सहयात्री जीवन में शामिल हो गए।
लेकिन, यह किशोर उदार है। अपनी साइकिल पर मुझे बिठाकर स्वयं से चला रहा है। उसकी बातें भी उसके भावों की तरह सरल-तरल-कोमल हैं। अब पता चला है कि एक मित्र के घर का ही बच्चा है। मेरे मुंह से अपना पिता का नाम सुनकर वह थोड़ा गंभीर हुआ है, थोड़ा जिम्मेदार भी। मुझे हाइवे पर उतारकर उसने बस आने तक प्रतीक्षा की। बस रोककर मुझे चढ़ने को कहा, फिर आशीर्वाद लिया। मेरी बस गुजर जाने तक वह खड़ा रहा। जिम्मेदार की तरह।
साइकिल की मद्धिम गति कितने सघन संबंध जोड़ती है। इस गति की ही, प्राप्ति है एक अल्हड़ किशोर का गाम्भीर्य से भर जाना। वहीं गंभीर व्यक्ति को केशौर्य की स्मृतियां अल्हड़ बना देती हैं। यह साइकिल की सहयात्राएं हल्की आंच सी हैं, जो पकाती नहीं सिद्ध करती हैं। अंचल निहारते चलने, पुकार सुनते चलने की वंचना से बद्ध नहीं करतीं, उसके लिए प्रतिबद्ध करती हैं।
(फरवरी, 2018 अपने गांव में)
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