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साइकिल की सहयात्रा

सड़क के किनारे खड़ा था। यात्रा तो करनी थी पर साधन नहीं था। ऐसे तो यात्राओं को साधन की जरूरत नहीं होती, चलने वाले के लिए तो डग भर धरती है, पाल के प्रसार भर सागर, पंख भर आकाश है। तब भी, अखंड काल को खंड में बांटने का अपरिहार्य अभ्यास है--'समय से पहुंचना'। सो, परामुखापेक्षा के भाव से सड़क पर सरपट दौड़ते वाहनों को निहार रहा था। उन्हीं में से किसी एक से मदद लेनी थी।  'मैं जहां खड़ा हूं, यहां सार्वजनिक परिवहन की सुविधा नहीं है। शुभ्र तने वाले अर्जुनों के पांत की परिधि से बंधी, और उसकी चार धारियों वाली कौड़ियों से पटी यह गांवों को जोड़ने वाली सड़क----अनगिनत वलय लेकर लोटी हुई हैं। संकरी लेकिन निर्दोष।' जिस पर हर कोई अपनी प्रतिबद्धताएं लिए भागा जा रहा है। दौड़ते वाहनों को डामर के किनारों की कच्ची पटान से कोई वास्ता नहीं। मैं इन्हीं उपेक्षित धारियों पर खड़ा हूं। सोच रहा हूं, कोई थोड़ा अलमस्त, थोड़ा मतवाला गुजर जाये तो शायद मुझे देख ले। उसी की गति में किनारों का ख्याल हो सकता है। यूं हर किसी को आवाज देना भी अच्छा नहीं। तभी एक लाल रंग की साइकिल वाला किशोर आकर ठहरता है, 'आपको कहीं चलना है,  ...