मेला: उद्गम भी और संगम भी
्रमैं समय हूं। महाभारत का संजय भी। वर्षों से यहां अपनी दिव्यदृष्टि के साथ विराजमान हूं। अपने अंदर संस्कृति, सभ्यता और इतिहास को समेटे हुये हूं। मैं अतीत का दर्पण हूं। गवाह हूं। देखता हूं, सुख भी, दुख भी। आंसुओं की धार का भी साक्षी हूं। मिलन के भी। बिछोह के भी। मैं एहसास हूं। सर्जक हूं। क्रांति का गर्भ भी। मैं शिक्षक भी, मेरा गुरुतर दायित्व है। मैं कर्तव्य और दायित्वों का मेल हूं। इसीलिये मेला हूं।सच मानिये! मेला सिर्फ मनोरंजन का स्थान नहीं। भीड़ या जन जमाव नहीं। भारतीय संस्कृति और सभ्यता का आईना है। वो आईना, जिसमें आदम के बच्चों ने अपने जीवन का विंब देखा। मेला ही है, जो आने वाली पीढ़ी को अपने इतिहास की याद दिलाता है। मेले के आयोजन के कई दिनों पहले से ही आसपास के गांव के युवक-युवतियां अपनी टोलियां बनाने और सजाने लगती हैं। साथ ही कपड़ों के चयन और व्यवस्थित श्रृंगार का क्रम शुरू हो जाता है।
एक अनुकरणीय पत्रकार से मुलाकात ने दोनों को आनंदित किया, आखिर अनौपचारिक जो थी। अनौपचारिक मुलाकातों का अपना ही मजा है, अलग ही चिंतन है। उनका आदेश था कि अनौपचारिक मुलाकातों पर कुछ सर्जना की जाये। याद आया मेला। बिछड़ों को मिलाने का वह स्थान, जहां जीवन मिलता है। संवरता है। सजता है। सुधर जाता है। वैसे तो मेले में हर मुलाकात अनौपचारिक होती है, फिर भी हम खास मकसद से मेले में पहुंचते हैं। और, ये मकसद हर उम्र के लोगों के लिए अलग-अलग होते हैं। सच में, मेले का विषय विराट है।
एक मायने में कहा जाए तो जीवन की सही दिशा मेले में तय होती है। मेले का मतलब ही मिलाप है। मेला लाखों पे्रम कथाओं का सर्जक रहा है। युवक युवती मिले। आंखें चार हुईं और वे एक दूसरे के हो लिये। स्व से ऊपर का जीवन। युवती चपल, चंचल है शावक सी। युवक गंभीर है, सुघड़। विपरीत गुणों के संगम की अद्भुत छटा। यही तो मेला है। बिना उद्देश्य के घर से निकल पडऩा और यहां आकर सब कुछ पा लेना।
महाकवि ने मेले पर खूब लिखा, मेला सजने के स्थान के बारे में लिखा। जलाशयों के सुरम्य तट का वर्णन किया। विचार करता हूं कि मेलों के लगने का स्थान हमेशा नदियों और सरोवरों के तट क्यों रहे हैं? नदियां प्रकृति की वह शिल्पकार हैं, जिन्होनें सभ्यताओं को गढ़ा है। संवारा है। और सजाया है। हरित आच्छादित प्राकृतिक शिल्प को रूप देने के काम नदियों का है।
मेला भी जीवन का शिल्प है। शिल्प नयेपन का सूचक होता है। मेले भी नयेपन का सूचक होते हैं। नई फसलों के कटने पर ही जुड़ते हैं मेले। मेले किसानों के कष्टों के साक्षी हैं और उन कष्टों को भुलाकर झूम उठने के प्रणेता हैं। मेले साक्षी हैं प्रेयसी के रुष्ट होने की और प्रणय को जगाकर प्रेमी को आश्वस्त करने का कि कैसे रूठे को वह मनाये। सच में मेला जिजीविषा का सर्जक है। तमाम झंझावातों से जूझकर नाच उठने का 'प्वाइंटÓ है।
मेला क्रंाति का गर्भ है। सामाजिक व सांस्कृतिक क्रांति का गर्भ। सत्ता पक्ष के खिलाफ उठ खड़े होने वाले जनसमूह को आंदोलित करने का सटीक स्थान। यदि मेले न होते तो किभी भी बड़ी क्रांति को स्वरूप नहीं दिया जा सकता था। माओ, लेनिन, माक्र्स व सन् 47 की भारतीय क्रांति। सबको पोषित करने का काम मेले ने किया। सच में मेला क्रांतिकारी है। परिवर्तनकारी भी।
मेला इतिहास है। अपने देश में लगने वाला हर मेला अपने दामन में किसी न किसी एक यादगार घटना के स्मरण को संजोये रखता है। उस क्षण की प्रेरणा मेले में ही आकर मिलती है।
मेला एहसास है। पसीने से लथपथ बदन के छुअन का। बिछड़ जाने के डर से सिहर उठने का एहसास। बिछड़ों को वापस पा लेने का अहसास। अहसास, आंखों से ओझल अपनों के दीदार का। प्रेम की पेंगों के उडऩ का एहसास।
मेला शिक्षक है। अर्वाचीन सामाजियों को पुरातन संस्कृति सिखाने वाला शिक्षक है। मेला ही था, ईदगाह का। जहां हामिद ने खिलौना खरीदने के पैसों से दादी के लिये चिमटा खरीद लिया, क्योंकि दादी की उंगलियां रोटियां सेंकते समय जल जाती थीं। एक मासूम को यहीं अपने दायित्व का बोध हुआ। जहां दादा जी को खिलौनों से प्रेम हो जाता है। बच्चा दादा जी का सुघड़ गांभीर्य हो उठता है। अजब-गजब का पाठ पढ़ाता है, मेला। मेले में शारीरिक सौष्ठव का प्रदर्शन भी होता है। दंगल जमता है। जीवन के दंगल में जूझ उठने को आतुर युवाओं का जयघोष। गुरुओं की ललकार। बड़ों का प्रोत्साहन। तभी तो मेले का गुरुतर दायित्व है। जहां एक ओर भारत का ग्राम्य जीवन चुनौती भरा है। अनंत संघर्ष। पेट पालने के लिये अनवरत तप। किंतु इस संघर्ष का अपना एक दायरा है, वे कभी ग्रामीणों के खुशियों का अतिक्रमण नहीं कर पाये। मेले में बांसुरी के तानों पर सब दुख को भुलाकर नायिका गुनगुनाने लगती है। यही तो जीवन का सार है जिसके साक्षात हमें मेले में होते हैं। दुख में दुखी होना कायरता नहीं, सुख में खुशी होना बहादुरी नहीं। लेकिन दुख में भी झूम उठना जीवटता तो है ही, जिसका ज्ञान हमें मेले में होता है। व्यापारिक नगरों से दूर प्रेम की उपजाऊ जमीन एक निश्चित समय पर संघर्ष और तप का परिणाम देती है, सुख की फसल जब किसान के खलिहान तक पहुंचती है तभी तो सजता है मेला। वास्तव में मेला कई सभ्यताओं का उद्गम है तो वहीं अर्वाचीन व प्राचीन विचारों-आचारों का संगम भी। मेले आज भी सजते हैं। वैसे के वैसे, बस उन्हेें देखने का हमारा नजरिया बदला है। हां, एक बात और मेलों के आयोजन में चीन का हस्तक्षेप भी बढ़ा है। एक मित्र कह रहे थे, बांसुरी और उसके तान वही हैं, बस बांस चीन का है। प्रत्येक आयोजनों में सामयिक परिवर्तन अपेक्षित होता है, मेला का आयोजन भी यदि थोड़ा बदला सा नजर आये तो कोई हर्ज नहीं। बस उद्देश्य नहीं बदलना चाहिये। क्योंकि मूलता के साथ खिलवाड़ क्षम्य नहीं।
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