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मेला: उद्गम भी और संगम भी ्रमैं समय हूं। महाभारत का संजय भी। वर्षों से यहां अपनी दिव्यदृष्टि के साथ विराजमान हूं। अपने अंदर संस्कृति, सभ्यता और इतिहास को समेटे हुये हूं। मैं अतीत का दर्पण हूं। गवाह हूं। देखता हूं, सुख भी, दुख भी। आंसुओं की धार का भी साक्षी हूं। मिलन के भी। बिछोह के भी। मैं एहसास हूं। सर्जक हूं। क्रांति का गर्भ भी। मैं शिक्षक भी, मेरा गुरुतर दायित्व है। मैं कर्तव्य और दायित्वों का मेल हूं। इसीलिये मेला हूं। सच मानिये! मेला सिर्फ मनोरंजन का स्थान नहीं। भीड़ या जन जमाव नहीं। भारतीय संस्कृति और सभ्यता का आईना है। वो आईना, जिसमें आदम के बच्चों ने अपने जीवन का विंब देखा। मेला ही है, जो आने वाली पीढ़ी को अपने इतिहास की याद दिलाता है। मेले के आयोजन के कई दिनों पहले से ही आसपास के गांव के युवक-युवतियां अपनी टोलियां बनाने और सजाने लगती हैं। साथ ही कपड़ों के चयन और व्यवस्थित श्रृंगार का क्रम शुरू हो जाता है। एक अनुकरणीय पत्रकार से मुलाकात ने दोनों को आनंदित किया, आखिर अनौपचारिक जो थी। अनौपचारिक मुलाकातों का अपना ही मजा है, अलग ही चिंतन है। उनका आदेश था कि अनौपचारिक मुलाकातों...