कवियों में संत हों, संतों में कवि हों
हिंदी साहित्य ‘त्रिकोण के त्रास’ में है। यह त्रिकोण प्रासंगिकता, प्रेताभिव्यक्ति और उधारी का चिंतन है। आज के साहित्य में यह तीनों छुपाए नहीं छुपते। जैसे, झीने सफेद आवरण से तमस नहीं छुपता बल्कि उसकी अभिव्यक्ति आवरण को भी तमस कर देती है, वैसे ही यह प्रकट हैं। यह सब आज के साहित्य का रूप हो सकता हैं, लेकिन उसके शाश्वत चिंतन और अपरिवर्तनीय लेकिन प्रवहमान तत्त्व की प्रतीति नहीं करता। हिंदी का कवि और साहित्यकार शाश्वत चिंतन और तत्त्व से बेसुध हैं। वह सबके मन की दोहराने और आरम्भिक बातें कहकर जन-मन-रञ्जन में ही अपनी सिद्धि खोज रहे हैं। जिन्होंने प्रगतिशीलता का चोला ओढ़ा है वह कभी पाश्चात्य तो कभी कम ज्ञात चिंतन का पुनर्पाठ गाते फिर रहे हैं। इससे वह भीड़ से अलग तो दिख जाते हैं लेकिन उनका भेद खिंचाव काल में खुल जाता है। साहित्य का सबसे बड़ा वर्ग बीते को दोहराने वाला है। यहां बीते युग की बातों को अनेक तरह से कहा जा रहा है। जो विचार और अभ्यास प्रवाह क्रम में छोड़े जा चुके हैं उनको गाकर, स्मृतियों में जीवंत रखकर पाठक को पाशबद्ध किया जा रहा है। पाठक अपने छूंछे छूटे उस जीवन को गाये जाने से प्रसन्न ह...