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निर्मल संत: नानकदेव की भेष, भावना और दशम गुरु के वरदान पाए सिखी के सारथी

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काहूँ से न राखे राग, दवैख हूँ न काहू संग, लोक कुल लाज खट खटो जिन न को है।  निम्रता से भरे रिदे निपुनता घरे रहे, राम क्रिश्न हरे पारब्रहम बोध जाको है।  निगम प्रवाह नितय जिन के निहाल सिंह, गिरा गुरु ग्रन्थ की मैं जाको प्रेम बाको है। निताप्रति निरोपाधि अहंबा बोध जाके, द्वैत मल कटी निरमले नाम या को है।      गुरु नानक पर विमर्श करना पंचनद की पावनता को साक्षात करना है, उसी प्रकार निर्मल संत परंपरा पर कुछ कहना या लिखना अमृत सरोवर में स्नान करने जैसा है। सिखों के आदिगुरु नानकदेव की भेष व भावना और दशम गुरु के वरदान से नवाजे इन संतों की परंपरा अनूठी है। सिमरन, साधना और संतोष से अद्वैत बोध को प्राप्त हुए यह संत 'सिखी के सारथी' हैं। सारथी ऐसे जैसे सूर्य की सारथी उसकी रश्मियां हैं। निर्मल सिख...नाम के साथ शास्त्री और वेदांताचार्य जैसी उपाधि जोड़ने वाले सिख सन्यासियों का एक समूह..जो अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के 13 अखाड़ों में से एक है। यह ऐसे सिख साधु हैं, जो कुंभ के समय शाही स्नान करते हैं। भारत की साधु परंपरा व पर्याय को यथारूप जीते हैं, साथ ही अमृतधारी सिख भी हैं। सिख पंथ क...