ज्ञानवापी पुनरुद्धार
भारत के प्राण परंपरा में है, परंपरा के प्राण सातत्य में। यह सततता सांसों की तरह घटित होती रहना जरूरी है। हालांकि सातत्य को सुनिश्चित करना दुरूह है, जब निरंतर प्रहार होते रहे हों। इसीलिए, हमारे पूर्वजों ने पुनर्जागरण की प्रविधि अपनाई। जो जहां रुक गया था, उसे छोड़ा नहीं वहीं से लेकर आगे बढ़े। विधर्मी इसे जानते हैं। इसीलिए, उनका हमेशा प्रयास है कि इस प्रवाह को रोकें। जबकि उन्हें पता होना चाहिए कि प्रवाह को रोकना प्रलय का कारण बनता है। वह अपने साथ, अवरोध के हर निशान बहा ले जाता है। ज्ञानवापी ही नहीं, भारत के कई प्राचीन मंदिर बीच में वर्षों तक खंडहर रहे हैं। फिर, पुनर्जागरण ने उन्हें प्रदीप्त किया। बौद्ध उत्कर्ष देखकर नहीं लगता था कि सनातन का अनादि प्रवाह अनंत तक चलेगा। लौ मद्धिम हो रही थी। तभी आद्य शंकराचार्य आये और बुझते दीये को तेल से भर दिया। शंकराचार्य की प्रेरणा के बाद कई प्राचीन मंदिरों के घंटे पुनः बजने लगे। ऐसा इस देश ने बहुत बार देखा है। हमारे ज्ञान केंद्र और मंदिर छीने गए, अपवित्र हुए। लेकिन उचित समय आने पर उन्हें पुनर्प्रतिष्ठा मिली। हालांकि कभ...