सरसों की पीयरी अब विरल हो रही है।
ऊंचे-छतनार वृक्ष दिगंबर हो खड़े हैं। उधर, पत्तियों की बिछावन पर मञ्जरियों से रस टपक रहा है। पत्तियों पर रस-सिक्त बूंदों की लयबद्ध थाप पर मौमाखियों का गुंजन,,,,जैसे मानस बाबा 'भ्रमर षडज' का नाद सिद्ध कर रहे हों। धनिया, मूली और नींबू के सफेद फूलों की छटा, शरद के बादलों की याद दिलाती है। इधर घासों का यौवन लौट आया है। रंग-बिरंगी पुष्पों से लदी घासें ऐसी लगती हैं, जैसे उन्होंने कोई समारोही परिधान पहन रखा हो। यह सर उठाकर नहीं, नजरें बिछाकर चलने का समय है। गेहूं के फसलों के बीच नीली पिम्परनेल खिली है। तो कहीं, कोनों पर वासंती अकरकरा की बस्ती है। उधर थोड़ा आगे, मयूर घास (स्क्वेररोज़ नैपवीड) की सजातीयता का लाल-गुलाबी संयोजन है। उसके बीच भटकटैया अपनी कांटेदार पत्तियों के बीच हल्के रंग की रुई से सज्जित 'फुलरा' लगाकर खड़ा है। चकमार्ग के अधिकांश भाग पर उगी दूर्वा फूल गई है। उसके चतुष्टय पुष्प, जैसे चार पुरुषार्थों का अर्थ उभार रहे हों। और, दूर्वा ने भी स्वीकार किया है कि यह 'धर्म' उसका भी है। मेथी की बालियां जैसे, नस्तालिक में जुनैद और मंसू...