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काशी में रामकृष्ण

     काशी में रामकृष्ण केदारघाट के दक्षिणी छोर पर गंगा जी की ओर बढ़ते हुए बड़े-बड़े भवनों की कतारें हैं। बंग शिल्प में निर्मित यह प्रासाद, भग्न लेकिन भव्य लगते हैं। ऊंचे और अभिमानी। बड़ी-बड़ी बारादरी औंधे चौरस गत्तों की तरह सजी हैं, एक दूसरे से सटी और सजातीयता से संयोजित। करीब 300 वर्ष पूर्व यह प्रासाद कलकत्ते से आये दीवान इन्द्रनारायण बापुली ने बनवाये थे। इन्द्रनारायण अवध नवाब के जागीरदार थे। मालदारों में गिनती थी। बापुली परिवार ऐश्वर्य का पर्याय था। लेकिन, इन भवनों पर उसकी छापें अब धूमिल हैं। काल प्रवाह से ऐश्वर्य अपनी गति को प्राप्त कर चुका है।  इन्हीं प्रासादों में से एक की अधनंगी दीवार पर बोर्ड टंगा है, जो बताता है कि यहां स्वामी रामकृष्ण परमहंस की पादुकायें रखी हैं। विराट व दिव्य स्मृतियों को सहेजे यह भवन अब डरावना लगता है, देह की भार से सीढियां कांप उठती हैं। लेकिन, जैसे-जैसे ऊपर बढ़ता हूं  अलौकिक अनुभव होता है। भीतर एक ही कमरा है जो जीर्णता से अछूता है। दरवाजा बंद है। मित्र शुभोजीत चिर-परिचित हंसी व अदब के साथ दरवाजा खोलते हैं।  दरवाजा खुलते ही---जैसे, आह...