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भारत को घूमना, देखना और जानना  

मैं दोहराता रहा हूं कि सबको प्रयास करना चाहिए कि भारत को आपादमस्तक निहार आएं। भारत भूमि पर विचरने का सुख अनन्य है। आज गणतंत्र दिवस पर फिर कह रहा हूं। इस देश में रहकर इसे जानना बहुत जरूरी है, और जानने के लिए जरुरी है उसे देखना। यह देखना और जानना किताबों से संभव नहीं, न ही दूसरों के कहने सुनने के आधार पर व अनेकता में एकता जैसे लतीफों में सम्भव है। घूमना भी 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' नहीं, 'रियलाइजेशन ऑफ भारत' की दृष्टि से होना चाहिए।  भ्रमण से भ्रम का नाश होता है। इस देश का भ्रमण करने से पहला भ्रम यह टूटेगा कि यहां 'अनेकता' है। घूमेंगे तब इसे 'एक आत्मा से प्रदीप्त, विराट देह सा' पाएंगे। निज अनुभव से मान्यता यह बनी है कि 'अनेकता में एकता' का नारा भारत की एकात्मता के विरुद्ध षड्यंत्र है। अनेकता को स्वीकार लेने के बाद एकता फ़न्ताशी  बनकर जाती है। सामान्य व्यवहार में हम दोस्ती यारी भी समान आचार-विचार वालों से करते हैं। विचार भिन्न भये नहीं कि रिश्ता खत्म। फिर 'अनेकता में एकता' कहां से आएगी? राजकीय एकीकरण एकता तो है नहीं। सबसे पहले यह दिमाग से निकालना ...